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Thursday, October 16, 2014

अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में खुलेंगे गर्ल्स डिग्री कॉलेज

  • सीतापुर समेत चार जिलों में कॉलेज निर्माण का प्रस्ताव मंजूर
  • 6.27 करोड़ का बजट प्रत्येक कॉलेज के लिए तय
  • कई अन्य जिलों से भी मांगे गए प्रस्ताव
लखनऊ। प्रदेश सरकार अब अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में गर्ल्स डिग्री कॉलेज खोलने जा रही है। ये कॉलेज केंद्र सरकार की मल्टी सेक्टोरल डवलपमेंट प्रोग्राम (एमएसडीपी) के तहत बनाए जाएंगे। पहले चरण में सीतापुर, मेरठ, बुलंदशहर व बिजनौर जिलों में कॉलेज बनाने को मंजूरी मिल गई है। कई अन्य जिलों से भी गर्ल्स डिग्री कॉलेज बनाने के लिए प्रस्ताव मांगा गया है।
अल्पसंख्यक बहुल जिलों में विकास के लिए केंद्र सरकार की ओर से एमएसडीपी योजना संचालित है। सरकार का मानना है कि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में गर्ल्स डिग्री कॉलेज खुलने से इस समुदाय की लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकेंगी।
आसपास कॉलेज न होने से अक्सर अल्पसंख्यक समुदाय अपनी लड़कियों को उच्च शिक्षा नहीं दिलाते हैं। इसको देखते हुए प्रदेश सरकार ने गर्ल्स डिग्री कॉलेज बनाने का निर्णय लिया है। पहले चरण में बिजनौर, सीतापुर, बुलंदशहर व मेरठ जिलों में गर्ल्स डिग्री कॉलेजों के निर्माण को मंजूरी मिल गई है। चारों ही जिलों के डीएम से जल्द जमीन का चयन कर निर्माण कार्य शुरू कराने को कहा गया है। प्रत्येक कॉलेज के लिए 6.27 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। गर्ल्स कॉलेज अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग बनवाएगा। भवन तैयार होने के बाद इसका संचालन उच्च शिक्षा विभाग ही करेगा। प्रदेश सरकार ने कई और जिलों से भी अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में गर्ल्स डिग्री कॉलेज खोलने के प्रस्ताव भेजने के लिए कहा है।


Wednesday, October 15, 2014

अल्पसंख्यक स्कूलों में भी आठवीं तक नहीं होगा कोई फेल

नई दिल्ली : आठवीं कक्षा तक छात्रों को अनिवार्य रूप से अगली कक्षा में उत्तीर्ण करने का नियम अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में भी लागू होगा। केंद्र सरकार ने साफ किया है कि यह संविधान की ओर से उनको दिए गए संरक्षण में बाधक नहीं है। इसी तरह इन स्कूलों को शारीरिक दंड पर पूरी तरह रोक के नियम को भी लागू करना होगा। मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रलय ने राज्य सरकारों को ये दोनों नियम सख्ती से लागू करने को कहा है। कुछ समय पहले राज्यों को लिखे पत्र में कहा गया है कि चाहे वह अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान की ओर से चलाया जा रहा स्कूल ही हो, ये नियम सभी स्कूलों पर लागू होते हैं। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून में ये दोनों प्रावधान किए गए हैं मगर सुप्रीम कोर्ट यह साफ कर चुका है कि आरटीई को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर लागू नहीं किया जा सकता। राज्यों को लिखे पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि संविधान में अल्पसंख्यक संस्थानों को जो छूट दी गई है, उनका ये नियम उल्लंघन नहीं करते।

Sunday, October 12, 2014

मदरसा छात्र बनेंगे कंप्यूटर सेवी

लखनऊ। प्रदेश के मदरसा छात्रों को अब मजहबी शिक्षा के साथ ही कंप्यूटर व इंटरनेट सेवी बनाया जाएगा। केंद्र सरकार की साइबर ग्राम योजना के तहत मदरसों के कक्षा छह से 10 तक के छात्रों को यह प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह योजना मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (एमएसडीपी) के सभी 144 ब्लॉक में चलाई जाएगी। प्रदेश सरकार मदरसों व उनमें पढ़ने वाले छात्रों की सूची को अंतिम रूप देने में जुट गई है। विशेष सचिव (अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग) राकेश कुमार मिश्र ने इसकी पुष्टि की है। योजना लागू करने वाले जिलों में बुलंदशहर, गाजियाबाद, हापुड़ और गौतमबुद्धनगर भी शामिल हैं।
केंद्र ने अपनी साइबर ग्राम योजना को उत्तर प्रदेश में भी लागू करने के निर्देश दिए हैं। इसी के बाद प्रदेश सरकार भी इस योजना को मूर्त रूप देने में जुट गई है। साइबर ग्राम योजना का मुख्य उद्देश्य चिह्नित अल्पसंख्यक क्षेत्रों के युवाओं को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना है जिससे वे आर्थिक व सामाजिक रूप से और मजबूत हो सकें।
इन जिलों में चलेगी योजना
सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा, मेरठ, गाजियाबाद, बरेली, बाराबंकी, फैजाबाद, सुलतानपुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, सिद्घार्थनगर, संतकबीरनगर, आजमगढ़, बुलंदशहर, बागपत, सीतापुर, बदायूं, बस्ती, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, गाजीपुर, महाराजगंज, पीलीभीत, गौतमबुद्घनगर, अलीगढ़, फिरोजाबाद, हरदोई, उन्नाव, कन्नौज, इटावा, कानपुर नगर, जालौन, महोबा, फतेहपुर, प्रतापगढ़, अंबेडकरनगर, संत रविदास नगर (भदोही), कासगंज, अमेठी, शामली, संभल व हापुड़।
साइबर ग्राम योजना से जुड़ेंगे प्रदेश के मदरसे

Saturday, October 11, 2014

आठ शिक्षक वाले मदरसों को भी मिलेगा अनुदान

  • सीएम की घोषणा को अमलीजामा पहनाने के लिए शिथिल किए जा रहे मानक
लखनऊ। आठ शिक्षक होंगे तो भी मदरसों को अनुदान मिल सकेगा। हालांकि यह सुविधा महज तीन महीने के लिए दी जाएगी। अब तक अनुदान के लिए प्रधानाचार्य के अलावा 12 शिक्षक होने चाहिए। तीन महीने के दौरान मदरसों को शिक्षकों के खाली पदों को भरना होगा।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मदरसों को अनुदान पर लेने की घोषणा को अमली जामा पहनाने के लिए अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने अब बीच का रास्ता निकाला है। इसके लिए अनुदान देने के लिए मानक शिथिल किए जा रहे हैं। सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण एसपी सिंह ने भी इसे हरी झंडी दे दी है। अब फाइल वित्त विभाग गई है। वहां से आने के बाद इसे जारी कर दिया जाएगा। सूत्रों के अनुसार जो बदलाव किए जा रहे हैं उसके तहत 12 शिक्षकों में से यदि आठ हैं तो भी उन्हें अनुदान दिया जा सकता है। अब तक जो मानक है उनमें एक भी शिक्षक कम रहने पर अनुदान नहीं दिया जा सकता। मानकों के शिथिल होने के बाद फिर से यह देखा जाएगा कि कितने मदरसों को अनुदान मिल सकता है। वहीं, छोटी-मोटी कमी दूर करने के लिए मदरसा संचालकों को समय भी दिया जा सकता है।
यहां भी मिलेगी राहत
दूसरा मानक जो शिथिल किया जाएगा वह शिक्षकों की भर्ती के विज्ञापन का है। अनुदान के लिए जब मदरसे आवेदन करते हैं तो उन्हें शिक्षकों की भर्ती का विवरण भी देना होता है। इसमें यह देखा जाता है कि मदरसे ने विज्ञापन प्रकाशित कराकर भर्ती की थी या नहीं। इसके लिए एक स्थानीय अखबार व एक राज्य स्तरीय अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कराना जरूरी है। इसे भी घटाकर सरकार एक स्थानीय व दूसरा मंडल स्तरीय अखबार करने जा रही है। मानक शिथिल होने से मदरसा संचालकों को काफी राहत मिल जाएगी।
एक मदरसे से सरकार पर 50 लाख का बोझ
अनुदान दिए जाने पर हर मदरसे से सरकार पर 50 लाख रुपये सालाना का बोझ आएगा। मदरसों में तैनात एक प्रधानाचार्य व 12 शिक्षकों (आलिया के लिए चार, फौकानिया के लिए तीन व तहतानिया के लिए पांच) के साथ ही एक क्लर्क व एक चपरासी का पूरा वेतन सरकार देती है। मदरसा अनुदानित होने के बाद कई तरह की सुविधाएं व योजनाओं का लाभ भी मिलने लगता है।
इसलिए पड़ी मानक बदलने की जरूरत
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वर्ष 2012 में सरकार बनने के बाद सूबे के 146 मदरसों को अनुदान देने का ऐलान किया था। मदरसों को दो वित्तीय वर्ष में अनुदान पर लेने की बात तय हुई थी। पहले वर्ष में 75 मदरसों को अनुदान पर लिया जाना था। लेकिन अब तक मदरसों को अनुदान नहीं मिल सका। दरअसल, अनुदान के लिए 194 प्रस्ताव मिले थे। लेकिन जब मानक मिलाए गए तो उसमें ज्यादातर फेल हो गए। महज एक दर्जन मदरसे ही ऐसे मिले जो मानक पूरे करते थे।